🇮🇳 भारतीय संसद – संरचना और कार्यप्रणाली
🇮🇳 भारतीय संसद – संरचना और कार्यप्रणाली
प्रस्तावना
भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहाँ जनता सर्वोपरि है और उसकी संप्रभुता का प्रतीक भारतीय संसद है। संसद भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था (Legislative Body) है, जो न केवल कानून बनाने का कार्य करती है बल्कि कार्यपालिका को उत्तरदायी भी बनाती है। लोकतंत्र में संसद की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे जनता की “आवाज” भी कहा जाता है।
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भारतीय संसद की संरचना
भारतीय संसद की संरचना संघीय स्वरूप वाली है। संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
भारतीय संसद तीन प्रमुख अंगों से मिलकर बनी है:
1. राष्ट्रपति
2. राज्यसभा (उच्च सदन / Council of States)
3. लोकसभा (निचला सदन / House of the People)
1. राष्ट्रपति
भारतीय संसद का अभिन्न अंग है।
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का प्रमुख होता है।
संसद का कोई भी सत्र राष्ट्रपति की अनुमति और आह्वान के बिना नहीं हो सकता।
किसी विधेयक को संसद द्वारा पारित करने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
2. राज्यसभा (Rajya Sabha)
इसे उच्च सदन कहा जाता है।
राज्यसभा संघ की इकाइयों यानी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है।
कुल सदस्य संख्या 250 (संविधान में प्रावधान), वर्तमान में 245 सदस्य।
233 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित।
12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान, और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों से नामित।
कार्यकाल – 6 वर्ष, प्रत्येक दो वर्ष बाद 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
सभापति (Chairman) – उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
3. लोकसभा (Lok Sabha)
इसे निचला सदन और वास्तविक अर्थों में जनता का सदन कहा जाता है।
वर्तमान सदस्य संख्या 545:
543 निर्वाचित सदस्य (जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव से)।
2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा एंग्लो-इंडियन समुदाय से (अब 104वें संशोधन 2019 के बाद समाप्त)।
कार्यकाल – 5 वर्ष, किन्तु राष्ट्रपति आवश्यकता अनुसार भंग कर सकता है।
स्पीकर (Speaker) लोकसभा का अध्यक्ष होता है।
लोकसभा को अधिक शक्तिशाली सदन माना जाता है क्योंकि यह जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।
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भारतीय संसद के मुख्य कार्य
भारतीय संसद के कार्यों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
1. विधायी कार्य (Legislative Functions)
संसद का प्रमुख कार्य कानून बनाना है।
विधेयक (Bill) दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद कानून (Act) बन जाता है।
संसद तीन प्रकार के विषयों पर कानून बना सकती है:
संघ सूची (Union List)
समवर्ती सूची (Concurrent List)
विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची (State List) पर भी।
2. वित्तीय कार्य (Financial Functions)
संसद को देश की वित्तीय नीतियों और बजट पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है।
वार्षिक बजट, अनुदान की मांग, कराधान आदि का अधिकार केवल लोकसभा को है।
सरकार एक पैसे का खर्च भी संसद की अनुमति के बिना नहीं कर सकती।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over Executive)
कार्यपालिका (प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद) संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।
प्रश्नकाल, शून्यकाल, अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव आदि के माध्यम से संसद सरकार को जवाबदेह बनाती है।
4. संविधान संशोधन (Constitutional Amendment)
संसद को संविधान संशोधन करने का अधिकार है (अनुच्छेद 368)।
साधारण बहुमत, विशेष बहुमत और राज्यों की सहमति सहित विशेष बहुमत से संशोधन किए जा सकते हैं।
5. न्यायिक कार्य (Judicial Functions)
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों के महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया संसद द्वारा होती है।
संसद न्यायिक मामलों में भी सीमित भूमिका निभाती है।
6. अन्य कार्य
अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों की पुष्टि।
नए राज्यों का निर्माण और पुनर्गठन।
आपातकाल की घोषणा की स्वीकृति।
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संसद के सत्र
संविधान के अनुसार संसद का वर्ष में कम से कम दो बार मिलना अनिवार्य है। आमतौर पर तीन सत्र होते हैं:
1. बजट सत्र (फरवरी–मई) – सबसे लंबा और महत्वपूर्ण।
2. मानसून सत्र (जुलाई–सितंबर)।
3. शीतकालीन सत्र (नवंबर–दिसंबर)।
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संसद की कार्यप्रणाली
संसद की कार्यवाही दोनों सदनों में स्पीकर और सभापति द्वारा संचालित होती है।
प्रश्नकाल और शून्यकाल संसद की कार्यप्रणाली को जीवंत बनाते हैं।
विधेयक प्रस्तुत करना, बहस करना और पारित करना इसकी नियमित प्रक्रिया है।
बहुमत आधारित निर्णय-प्रणाली अपनाई जाती है।
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भारतीय संसद की विशेषताएँ
1. संघीय लेकिन शक्तिशाली केंद्र।
2. द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameral Legislature)।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण।
4. वित्तीय सर्वोच्चता।
5. जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी।
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संसद की सीमाएँ और चुनौतियाँ
1. सदन की कार्यवाही में व्यवधान (वॉकआउट, हंगामा)।
2. दल-बदल और पार्टी व्हिप की मजबूरी।
3. पैसे और ताकत का प्रभाव चुनावों पर।
4. जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का अभाव।
5. कम उपस्थिति और कम समय का उपयोग।
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निष्कर्ष
भारतीय संसद लोकतंत्र की धड़कन है। यह न केवल कानून बनाती है बल्कि सरकार को उत्तरदायी बनाती है और जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देती है। संसद की कार्यप्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी है कि सांसद जिम्मेदारी और अनुशासन का पालन करें। एक मजबूत और जवाबदेह संसद ही भारत को सही मायनों में लोकतांत्रिक गणराज्य बनाए रख सकती है।
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